योग मानव जीवन के लिए वरदान है हम योग के माध्यम से पूरे विश्व का कल्याण कर सकते हैं। योग एक वैज्ञानिक रूप से शरीर और मन को स्वस्थ रखने की कला है। योग जीवन जीने की कला है। योग जीवन जीने की पद्धति है। योग हमारे जीवन को अनुशासित करता है। भारत में योग प्राचीन काल से प्रचलित है। महर्षि पतंजलि ने ईशा से चौथी शताब्दी पूर्व योग को एक दार्शनिक रूप दिया । महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र नामक पुस्तक की रचना की जिसमें उन्होंने 195 सूत्र या श्लोक लिखे। महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग की रचना की जिसमें उन्होंने योग के आठ अंग बताएं । यम ,नियम, आसन ,प्राणायाम ,प्रत्याहार, धारणा ,ध्यान और समाधि। यम का तात्पर्य है मानसिक शुद्धीकरण या मानसिक अनुशासन । यम को महर्षि पतंजलि ने पांच भागों में बांटा है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। प्रारंभिक तौर पर योग साधक को अपने जीवन में नियम का पालन करना आवश्यक है। यम के अंतर्गत योग साधक सत्य ,अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का पालन करता है सत्य का अभ्यास करने से मन शांत रहता है अहिंसात्मक आचरण करने से भी मन को एकाग्र करने में मदद मिलती है अस्तेय का अर्थ होता है चोरी न करना ।अपरिग्रह से तात्पर्य है आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह ना करना या विलासिता पूर्ण जीवन न जीना। ब्रह्मचर्य से तात्पर्य है संयम पूर्ण जीवन जीना। ब्रह्मचर्य का पालन करके मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखा जा सकता है। ब्रह्मचर्य संयम पूर्ण जीवन जीना सिखाता है। महर्षि पतंजलि ने नियम को भी 5 भागों में बांटा है। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणी धान। नियम शरीर का अनुशासन व शुद्धीकरण है। इस प्रकार यम जहां मन का शुद्धीकरण है वही नियम शरीर का शुद्धीकरण है। आसन के विषय में कहा गया है "स्थिरसुखमासनम" अर्थात स्थिरता पूर्वक सुख की अनुभूति जिस स्थिति में होती है वही आसन है। आसन कई प्रकार के होते हैं भारत में 8400000 योनियों मानी जाती है उतने ही प्रकार के आसन होते हैं। लेकिन इनमें कुछ आसन महत्वपूर्ण है जिनकी संख्या लगभग 36 है। आसन को हम चार भागों में बांट सकते हैं पहला बैठने वाले आसन दूसरा खड़े होने वाले आसन तीसरा पेट के बल लेटने वाले आसन चौथा पीठ के बल लेटने वाले आसन। आसन के द्वारा जहां हमें शरीर की सही स्थिति प्राप्त होती है वही हम शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ तंदुरुस्त और लचीले रह सकते हैं। आसनों के अभ्यास से हमारा शरीर गठीला, लचीला व सुसंगठित और रोग रहित बनता है आसनों के अभ्यास से हम अपने शरीर में सुंदरता तेज और फुर्ती ला सकते हैं। प्राणायाम के अंतर्गत श्वास प्रश्वास के अभ्यास से हम अपने मन को, आंतरिक अंगों को व स्वसन संस्थान को मजबूत व रोग रहित रख सकते हैं। प्रत्याहार के अंतर्गत हम अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हैं मन को नियंत्रित रख कर सादा जीवन जीने की कोशिश करते हैं। धारणा के अंतर्गत हम अपने मन को किसी खास ऑब्जेक्ट पर केंद्रित करने का प्रयास करते हैं। धारणा ध्यान से पहले की स्थिति है धारणा के अभ्यास से हमारा मन ध्यान के लिए तैयार होता है। ध्यान के अंतर्गत हम अपने मन को शरीर के अंदर या बाहर किसी ऑब्जेक्ट पर केंद्रित करना प्रारंभ कर देते हैं। प्रारंभ में ध्यान बहुत कम लगता है लेकिन धीरे-धीरे ध्यान के अभ्यास से हमारा मन किसी खास ऑब्जेक्ट पर केंद्रित होने लगता है। हम अपना ध्यान शरीर के अंदर स्थित सात चक्रों पर भी लगा सकते हैं यह सात चक्र हैं 1.स्वाधिष्ठान चक्र 2. मूलाधार चक्र 3. मणिपुर चक्र 4. अनाहत चक्र 5.विशुद्धि चक्र 6. आज्ञा चक्र 7. सहस्रार चक्र। इन सात चक्रों पर नियमित ध्यान करने से कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है जो कि हमारे शरीर में ऊर्जा का अपार भंडार है कुंडलिनी शक्ति हमारे शरीर और मन की असीम शक्ति है। समाधि अष्टांग योग का सबसे अंतिम भाग है। समाधि के द्वारा व्यक्ति को कल्याण या मोक्ष प्राप्त होता है समाधि जो कि योग की उच्चतमअवस्था है इस स्थिति को बहुत कम लोग प्राप्त कर पाते हैं। समाधि प्राप्त होने पर व्यक्ति सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार योग एक संपूर्ण जीवन दर्शन है। योग रूपी मार्ग पर चलकर व्यक्ति अपने जीवन के परम उद्देश्य को प्राप्त कर सकता है। योग दर्शन के साथ-साथ एक विज्ञान भी है योग के द्वारा हम शारीरिक ,मानसिक व बौद्धिक रूप से स्वस्थ रह सकते हैं। योग हमें बीमारियों से बचाता है। योग हमें स्वस्थ जीवन प्रदान करता है और योग हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। योग के माध्यम से हम पूरे विश्व में नैतिकता व अनुशासन ला सकते हैं। योगाभ्यास को बच्चे, बड़े ,बूढ़े ,महिलाएं सभी कर सकते हैं। योग सभी सीमाओं,जाति, संप्रदाय आदि से परे है ।योग बंधन से मुक्त है योग के अभ्यास से संपूर्ण विश्व का कल्याण हो सकता है। योग अत्यंत सरल व कम खर्चीला है योग में कम से कम संसाधनों की आवश्यकता होती है अंत में मैं कहना चाहूंगा -करें योग रहें निरोग। आपको कैसा लगा यह लेख अवश्य बताएं। धन्यवाद। आर.एल. शर्मा..........
An ideal Teacher is a teacher who has many qualities, values ,knowledge, and also do his work with responsibility, honestly and sincerely. He always ready to sacrifice many things because many people follow him. Teacher is also a human being, he has many wishes and hobbies but sometimes he can't fulfill them, he always thinks people will see him to do this kind of act and never forgive him. The true and ideal Teacher does his work and present himself in front of society as a leader of society. Teacher is a social engineer. He construct valuable society. He transfer the values and culture into the new generation. He waters the plants (students) with his hard work and values (sanskars). A good teacher always ready to sacrifice and contribute to society. A good teacher has a mantra -work is worship. An ideal teacher always does self-study and remain updated. ...
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